यमुना एक्सप्रेसवे पर टोल वृद्धि न करने के आदेश का स्वागत लेकिन , अब टोल समाप्त होना चाहिए
: मुकेश कुमार मासूम
यमुना एक्सप्रेसवे पर टोल बढ़ाने का प्रस्ताव केवल आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि आम जनता की जेब पर लगातार बढ़ता बोझ है। वैसे अभी -अभी यमुना एक्सप्रेसवे पर प्रस्तावित टोल वृद्धि को लेकर विधायक धीरेन्द्र सिँह जी द्वारा जनहित में किया गया प्रयास सफल हुआ। माननीय मुख्यमंत्री आदित्य नाथ जी ने इस विषय का संज्ञान लेते हुए टोल दरों में वृद्धि न किए जाने का निर्देश दिया है। वर्तमान वैश्विक एवं राष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों के बीच यह निर्णय असंख्य यात्रियों को बड़ी राहत प्रदान करेगा। इसके लिए विधायक श्री धीरेन्द्र सिँह ने मुख्यमंत्री जी का हृदय से आभार प्रकट किया है।
लेकिन आज आवश्यकता टोल बढ़ाने की नहीं, बल्कि इस पूरे टोल सिस्टम की निष्पक्ष समीक्षा करने की है। जनता के बीच अब यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि जब एक्सप्रेसवे निर्माण की लागत कई गुना वसूल की जा चुकी है, तब आखिर कब तक जनता से टोल लिया जाता रहेगा?
यमुना एक्सप्रेसवे देश के सबसे महंगे टोल मार्गों में गिना जाता है। ग्रेटर नोएडा से आगरा तक एक सामान्य कार चालक को लगभग 485 रुपये टोल देना पड़ता है। भारी वाहनों से हजारों रुपये प्रतिदिन वसूले जाते हैं। प्रतिदिन लगभग 50,000 से अधिक वाहन इस मार्ग से गुजरते हैं। ऐसे में अनुमान लगाया जा सकता है कि कंपनी को प्रतिदिन करोड़ों रुपये का राजस्व प्राप्त हो रहा है।
प्रश्न यह है कि क्या यह केवल सड़क रखरखाव का खर्च है, या फिर जनता से लगातार कमाई का माध्यम बन चुका है?
कई आर्थिक विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि देश में अधिकांश टोल परियोजनाओं में निर्माण लागत वर्षों पहले ही निकल चुकी होती है, लेकिन अनुबंध और नीतियों के नाम पर जनता से अनिश्चितकाल तक वसूली जारी रहती है। यमुना एक्सप्रेसवे पर भी यही स्थिति दिखाई देती है। कंपनी को भूमि, सरकारी सहयोग, यातायात सुविधा और लगातार बढ़ता ट्रैफिक — सबका लाभ मिला है। अब जेवर एयरपोर्ट और औद्योगिक कॉरिडोर शुरू होने के बाद ट्रैफिक और आय दोनों कई गुना बढ़ने वाले हैं।
ऐसे में टोल बढ़ाने का प्रस्ताव जनता को यह संदेश देता है कि विकास का पूरा भार केवल आम नागरिक ही उठाएगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सड़कें जनता के टैक्स के पैसे से भी बनती हैं। नागरिक पहले ही रोड टैक्स, पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स, वाहन पंजीकरण शुल्क और जीएसटी देते हैं। इसके बावजूद हर यात्रा पर अलग से टोल देना लोगों को दोहरी और कई बार तिहरी आर्थिक मार जैसा लगता है।
यदि कोई व्यक्ति रोज़ नौकरी, व्यापार या शिक्षा के लिए एक्सप्रेसवे का उपयोग करता है, तो महीने में हजारों रुपये केवल टोल पर खर्च हो जाते हैं। इसका सीधा असर मध्यम वर्ग, छोटे व्यापारियों, किसानों और ट्रांसपोर्ट क्षेत्र पर पड़ता है। परिवहन महंगा होने से वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ती हैं, जिसका असर पूरे समाज पर पड़ता है।
देश के कई हिस्सों में जनता ने लंबे समय तक चलने वाली टोल वसूली के खिलाफ आवाज उठाई है। महाराष्ट्र, हरियाणा और अन्य राज्यों में भी समय-समय पर यह मांग उठती रही है कि लागत वसूली के बाद टोल समाप्त किया जाए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई देशों में BOT (Build-Operate-Transfer) मॉडल के तहत लागत पूरी होने के बाद टोल समाप्त कर दिया जाता है या बेहद न्यूनतम रखा जाता है।
यमुना एक्सप्रेसवे के मामले में भी अब पारदर्शिता आवश्यक है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि:
- अब तक कुल कितनी टोल वसूली हुई?
- निर्माण और रखरखाव पर वास्तविक खर्च कितना हुआ?
- कंपनी ने कितना लाभ अर्जित किया?
- आखिर टोल समाप्त करने की कोई समय सीमा क्यों नहीं है?
यदि कंपनी वास्तव में लागत से कई गुना अधिक राजस्व प्राप्त कर चुकी है, तो लगातार टोल वसूली जनता के बीच शोषण की भावना पैदा करती है।
अब समय आ गया है कि जनता संगठित होकर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से यह मांग उठाए कि: - यमुना एक्सप्रेसवे पर प्रस्तावित टोल वृद्धि तत्काल वापस ली जाए।
- पूरी परियोजना की वित्तीय ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
- लागत वसूली पूरी होने पर टोल समाप्त किया जाए।
- स्थानीय निवासियों, किसानों, छात्रों और दैनिक यात्रियों को स्थायी राहत दी जाए।
विकास का अर्थ केवल बड़ी सड़कें और चमकदार परियोजनाएँ नहीं होता। वास्तविक विकास तब माना जाएगा जब आम आदमी को राहत मिले, न कि हर कुछ किलोमीटर पर उसकी जेब खाली की जाए।
जनता अब यह पूछ रही है —
“जब लागत निकल चुकी, तो टोल किस बात का?”

